• पश्चिमबंग हिंदी अकादमी द्वारा उत्तर बंगाल में माहव्यापी आयोजन का पहला दिन 'लेखन में समाज
• दिलीप दुगड़ ने श्रोताओं का स्वागत किया और ऐसे कार्यक्रम के लिए मुख्यमंत्री की ओर से दिए गए विशेष उपहार पर प्रकाश डाला गया
एनई न्यूज भारत, सिलीगुड़ी: समाज में लेखन' शीर्षक से क्षेत्रीय संगोष्ठी के साथ संपन्न हुआ। अकादमी के सदस्य श्री दिलीप दूगड़ ने स्वागत करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री उत्तर बंगाल में माहव्यापी आयोजन के रूप में एक विशेष उपहार प्रदान किया है। अकादमी के अध्यक्ष श्री विवेक गुप्त ने पूरी संवेदना के साथ वैचारिक, मनोरंजनपरक, अकादमिक एवं शोधपरक आयाम विकसित करने की विशेष पहल की है। अकादमी के सदस्य डॉक्टर अजय कुमार साव ने कहा कि लेखन में विघटित समाज के साथ शक्ल बदलकर बन रहे आभासी समाज की वास्तविकता को विषय बनाया जाना चाहिए। साथ ही इस दिशा में हमें गंभीर बने रहने की जरूरत है कि ऐसा कौन-सा समाज तैयार हो रहा है जिसमें लेखन को पुरस्कार, सम्मान मिलते जा रहे हैं और घटती पाठकीय रुचि को लेकर पाठकों पर शिकायतें भी मढ़ी जा रही हैं। लेखन में विमर्श के साथ नए विमर्श की अपेक्षित जमीन की जरूरत को गंभीरता से तैयार की जाने की जरूरत है। देखना होगा कि विमर्श खड़ा करने के आनन-फानन में हम कहीं विकृति के विरुद्ध एक नई विकृति को तो जन्म नहीं दे रहे हैं। लेखन कहानी, उपन्यास से आगे पत्रकारिता में भी है और फेसबुक का ऐसा समाज तैयार हुआ है जिसमें पसंद-नापसंद के लेखन के प्रति रूचिगत अभिनय जोरों पर है। इससे लेखक और लेखन दोनों को सावधान रहने की जरूरत है।
डॉ ओमप्रकाश पांडेय ने विषय प्रवर्तन के दौरान मूल्यगत विघटन के दौर में साहित्यिक व्यभिचार का जिक्र करते हुए लेखन के स्ताधीन स्वरूप की कड़ी आलोचना की और आगे कहा कि लेखन सत्ता की निर्मिति नहीं हो, बल्कि सत्ता का नियामक बने।
मुख्य अतिथि देवेंद्र नाथ शुक्ल ने लेखन में विभाजन की मानसिकता से ग्रसित समाज से परहेज की बात की और आगे कहा कि धर्म, राजनीति के विभाजनकारी विध्वंसक सत्य को साहित्य में भाषिक मर्यादा के साथ अवश्य ही विषय बनाया जाना चाहिए। डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह ने बतौर मुख्य वक्ता लेखन में वैश्विक समाज की हिमायत क। लेखन में समसामयिक, धार्मिक, राजनीतिक विसंगतियों को विषय बनाए जाने पर जोर दिया। साथ ही पत्रकारिता में रोजगारमूलक दबाव के तहत किए गए लेखन के प्रति निराशा व्यक्त की।
लेखिका डॉ. वंदना गुप्ता ने लेखन और जरूरी लेखन के फर्क के प्रति संवेदनशील होने की मांग करती हुई 'कुनबावादी समाज' में जारी साहित्यिक गतिविधियों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की और इस बात पर जोर दिया कि जिन सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण पाठक विघटनकारी साजिश के शिकार हो रहे हैं उनका लेखन में पर्दाफाश किया जाना चाहिए।
कवयित्री किरण अग्रवाल ने लेखन के प्रति सामाजिक अरुचि को लेकर असंतोष प्रकट किया तो कवयित्री भारती बिहानी ने लेखन के प्रति फेसबुक में बने समाज के मद्देनजर लेखन के प्रति घटित विडंबना को विषय बनाया। कवयित्री प्रेरणा यादव ने लेखन में सत्ता-व्यवस्थागत निरंकुश्ता से मुक्त समाज के चित्रण को अनिवार्य बताया। कवयित्री रूबी प्रसाद ने लेखन में जारी विषयों से आगे बच्चे, युवा, महिलाओं के साथ घटित शक्ल बदलकर जन्मी विकृतियों को विषय बनाने की बात की और कहा कि ऐसा करने से ही पाठक हमसे जुड़ेंगे।
युवा कवयित्री प्रियंका जायसवाल ने आशा जताई कि यदि सोशल मीडिया की विकृति को विषय बनाया जाएगा तब सोशल मीडिया मैं पाठक की रुचि बढ़ेगी और लेखन को सही दिशा उपलब्ध होगी।
लेखिका कल्पना सिंह लेखन में अभिव्यक्त समाज को जरूरी आयाम देने की बात की। उपस्थित श्रोता दीर्घा में ज्योति श्रीवास्तव, चाहत जायसवाल ने अपनी जिज्ञासाएं व्यक्त की। शिक्षक राम प्रकाश श्रीवास्तव ने तेजी से बदल रहे डिजिटल समाज से जन्मे बहुआयामी विषयों को लेखन में जगह देने की अपील की ताकि पाठक समाज अपनी सक्रियता में एक सार्थक समाज की ओर बढ़ पाए।
इस अवसर पर लेखिका उषा गहतराज, सुनाम प्रसाद, एकता प्रियदर्शनी, आरती कुजूर, रेखा थापा, रेखा साह, वी आकाश राव, दिनेश साव, डीपीएस की शिक्षिका कुमारी रीता सिंह के साथ भारी संख्या में विद्यार्थी समाज उपस्थित रहा। कार्यक्रम का कुशल संचालन अकादमी के सदस्य डॉक्टर अजय कुमार साव ने किया।
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