नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को तमाम संभावनाओं से समृद्ध करने की दिशा में अकादमी कृत संकल्प: डॉ. ओम प्रकाश पांडेय
एनई न्यूज भारत, सिलीगुड़ी
पश्चिमबंग हिंदी अकादमी द्वारा परिकल्पित माहव्यापी आयोजन के अंतिम दिन 'प्रासंगिकता के सवाल और प्रेमचंद' शीर्षक से विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रो० डॉ. राहुल सिंह की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। अकादमी के सदस्य दिलीप दुगड़ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देशन में परिकल्पित माहव्यापी आयोजन के तहत कुल 9 कार्यक्रमों को उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया। डॉ. ओम प्रकाश पांडेय ने नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को तमाम संभावनाओं से समृद्ध करने की दिशा में अकादमी को संकल्प कृत बताया। विषय प्रवर्तन करते हुए अकादमी के सदस्य डॉ० अजय कुमार साव ने प्रासंगिकता के इस्तेमाल में पर्याप्त सजगता के अभाव को संस्कारित किए जाने को अनिवार्य बताते हुए कहा कि प्रासंगिकता सिर्फ अतीत से वर्तमान का मिलान नहीं हो सकती। समय के संघर्षों में उभर आए प्रसंगों के साथ सदियों पहले की रचना या फिर रचनाकार हमारे लिए अनुकरणीय बन जाते हैं, तभी प्रासंगिक होते हैं, ना कि विषयगत सतही साम्य मात्र रखने से। साथ ही प्रस्तावित किया कि क्या प्रासंगिकता की जगह 'पुनर्पाठ' का प्रयोग कुछ हद तक सार्थक प्रतीत नहीं होता?
डॉ राहुल सिंह ने बीज वक्तव्य के दौरान प्रासंगिकता को वैधता के रूप में लेते हुए कहा कि जब 'गैर प्रासंगिक' भी आज प्रासंगिक हो रहे हों, तब प्रासंगिकता स्वयं में एक सवाल है। रचना एवं रचनाकार का पूर्व पक्ष उनका अपना समय है तो उत्तर पक्ष उनकी वर्तमान अर्थवत्ता है और इसी निरंतरता में प्रासंगिकता की अग्रगति देखी जा सकती है। सत्ता-संस्थाओं द्वारा ब्रांडिंग की गई प्रासंगिकता से अवश्य ही परहेज किए जाने की जरूरत है।
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रहीम मियां ने कहा कि प्रासंगिकता के केंद्र में घटना, मूल्य और संवेदना को अनिवार्य कसौटी के रूप में लिया जा सकता है। 'ईदगाह' के मार्मिक प्रसंग चिमटा का खरीदा जाना आखिर किस तरह आज प्रेमचंद की प्रासंगिकता को स्थापित करता है? यह विचारणीय है क्योंकि आज हम सभी उपयोगिता की जगह उपलब्धता को महत्व देने की होड़ में शामिल हैं। डॉ० बिनय कुमार पटेल ने प्रेमचंद के रचना संसार में बहुआयामी विषयों की वर्तमान उपस्थित में प्रेमचंद की प्रासंगिकता का बोध कराया। साहित्यकार डॉ० वंदना गुप्ता ने तुलसीदास और प्रेमचंद के रचनात्मक सरोकार के तहत प्रासंगिकता की अग्रगति पर जिज्ञासा प्रकट की।
एक और जहां डॉ० विनय कुमार पटेल ने प्रेमचंद के द्वारा विषय बनाई गई समस्याओं को आज भी व्याप्त होने और आगे बने रहने में प्रासंगिकता स्थापित की तो वही डॉ० राहुल सिंह ने इस दिशा बोध को दो चरणों में दिखाए और कहां की स्त्री, दलित, किसान की समस्याएं आज भी हैं पर प्रेमचंद के समय से कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण है। आगे भी इसकी जटिलता अधिक चुनौतीपूर्ण बनी रहेगी। ऐसे में प्रेमचंद हमेशा संदर्भवान बने रहेंगे। चर्चा करते हुए अकादमी के सदस्य डॉ० अजय कुमार साव ने कहा कि कोई भी प्रसंग स्थिति विशेष में चिंतन का विषय बनता है और इस प्रसंग में जब रचनाकार अनुकरणीय बन जाता है तब उसकी प्रासंगिकता स्थापित होती है।
इसी के साथ राजनीतिक परिदृश्य में साहित्यकारों की जवाबदेही को घेरे में लेते हुए बहस चरम पर पहुंच गई कि सत्ता-सियासत के खिलाफ लिखना राजनीति करना क्यों समझ लिया जाए और यदि प्रेमचंद ने ऐसा किया तो क्या वे राजनीति कर रहे थे या वैचारिक प्रतिबद्धता का निर्वाह कर रहे थे? राजनीति से परहेज के नाम पर कंफर्ट जोन में किया गया लेखन परिवर्तनकामी से अधिक स्वांत:सुखाय ही रचता है। ऐसी स्थिति में ऐसे सर्जकों द्वारा प्रेमचंद को प्रासंगिक बताया जाना भी गैर प्रासंगिक प्रतीत होता है । इस अवसर पर मुक्त चर्चा में देवेंद्र नाथ शुक्ल,ओम प्रकाश पांडे, रूबी प्रसाद, कल्पना सिंह ,नेहा शाह, प्रियंका जायसवाल, रजनी भगत ,एकता प्रियदर्शिनी , रहीम मियां,पूनम सिंह, आरती कुजूर, प्रियंका दास, मनीष गुप्ता, ज्योति श्रीवास्तव निशु साहू ,अंशु गुप्ता, निखिल सहनी ,शिवम प्रसाद, दीपक पासवान , कुमारी रीता सिंह, बिंदु गुप्ता ने वैचारिक पहल की।
माहव्यापी आयोजन के दौरान समापन सत्र के अवसर पर प्रतियोगिता के विजयी प्रतिभागियों, गीत, नृत्य एवं काव्य पाठ की प्रस्तुति, विशेषज्ञ वक्ता, अतिथि, प्रबंधन समिति के सदस्यों, परिसंवाद में वैचारिक सहभागिता, कुशल संचालन के लिए स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए । राजनंदिनी और ज्योति भट्ट के कुशल संचालन में संपन्न समारोह सत्र के अवसर पर प्राचार्य डॉ० श्याम सुंदर अग्रवाल ,नंदिता नदी , तापसी पाल बनिक, अर्चना शर्मा, श्याम सुंदर शर्मा, डॉ० सविता मिश्रा के साथ सीता राउत, मनोज सिंह, सुरेंद्र प्रसाद शाह ,संजय शाह, नम्रता त्रिपाठी, माला निरोला, डॉ० राम प्रकाश श्रीवास्तव, देवाशीष राय , राधेश्याम साह, संचिता देव बर्मन, गुंजन गुप्ता, राजेंद्र प्रसाद एवं सिंह, संजय शर्मा, बैजू अग्रवाल, दीपू शर्मा, पराग विश्वास की उपस्थिति में अकादमी के भाविक कार्यक्रमों को लेकर सार्थक सुझाव भी रखे गए।