महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन के प्रमुख तुकाराम मुंढे की ओर से खुले और बिना सील वाले खाद्य तेल की बिक्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई की पहल निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। हाल में महाराष्ट्र FDA ने खुले खाद्य तेल की बिक्री पर रोक लगाने और आपूर्ति शृंखला में जवाबदेही तय करने की दिशा में कड़े कदम उठाए हैं। उद्देश्य साफ है—मिलावट, असुरक्षित भंडारण और उपभोक्ता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ पर लगाम।
लेकिन इस कार्रवाई के साथ कुछ बुनियादी सवाल भी उठने चाहिए। ये सवाल केवल किसी एक दुकानदार, व्यापारी या कंपनी के खिलाफ नहीं हैं। ये सवाल उस ग्रामीण भारत की ओर से हैं, जो सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, सूरजमुखी और अनेक दूसरे तिलहनों का वास्तविक उत्पादक है।
सबसे पहला सवाल है—खाद्य तेल में ‘शुद्धता’ की कानूनी परिभाषा आखिर क्या है?
आज उपभोक्ता के सामने दो अलग-अलग तस्वीरें हैं। एक तरफ खुले तेल में मिलावट के खिलाफ अभियान चलाया जाता है। दूसरी तरफ कानून कुछ तेलों को निर्धारित अनुपात में मिलाकर बेचने की अनुमति देता है। तकनीकी और खाद्य-सुरक्षा के दृष्टिकोण से दोनों में अंतर हो सकता है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए सवाल बहुत सरल है—जिस तेल को वह सरसों का तेल समझकर खरीद रहा है, उसमें वास्तव में सरसों का तेल कितना है?
यहां एक तथ्य स्पष्ट करना भी जरूरी है। सोशल मीडिया पर अक्सर सफोला गोल्ड के उदाहरण में 80 प्रतिशत राइस ब्रान और 20 प्रतिशत सोयाबीन तेल बताया जाता है। वर्तमान उपलब्ध उत्पाद विवरण के अनुसारसफोला गोल्ड 80 प्रतिशत रिफाइंड राइस ब्रान ऑयल और 20 प्रतिशत रिफाइंड सैफ्लावर ऑयलका मिश्रण है। सोयाबीन वाला मिश्रण सफोला एक्टिव से जुड़ा है। यानी यह उत्पाद ‘मिलावटी’ नहीं, बल्कि घोषित और नियमन के तहत बिकने वाला ब्लेंडेड/मल्टी-सोर्स एडिबल ऑयल है।
यही अंतर हमारे मूल प्रश्न को और गंभीर बना देता है।क्या ‘कानूनी रूप से स्वीकृत मिश्रण’ और ‘शुद्ध तेल’ को उपभोक्ता की भाषा में एक ही समझा जाना चाहिए?
FSSAI के मौजूदा मानकों में दो खाद्य वनस्पति तेलों के मिश्रण को Multi-Source Edible Vegetable Oil के रूप में अनुमति दी गई है, जिसमें प्रत्येक तेल की हिस्सेदारी कम-से-कम 20 प्रतिशत हो सकती है। साथ ही पैकेट पर मिश्रण और उसके अनुपात की घोषणा का प्रावधान है।
लेकिन सरसों के मामले में स्थिति अलग है। FSSAI ने 8 जून 2021 से सरसों तेल को किसी दूसरे खाद्य तेल के साथ मिलाकर Multi-Source Edible Oil बनाने पर प्रतिबंध लागू किया है और 2022 में राज्यों को इसके कड़ाई से पालन के लिए फिर निर्देश दिए थे। इसलिए 30 या 40 प्रतिशत पाम ऑयल मिलाकर बेचे जाने वाले उत्पाद को कानूनी रूप से ‘शुद्ध सरसों तेल’ कहना वर्तमान व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है।
फिर भी बहस यहीं खत्म नहीं होती। सवाल यह है किक्या कानून की भाषा उपभोक्ता की समझ जितनी स्पष्ट है?
भारत में खाद्य तेल केवल एक बाजार नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। 2025-26 में देश में नौ प्रमुख तिलहनों का उत्पादन लगभग 4.10 करोड़ टन रहने का अनुमान था। इसके बावजूद भारत अपनी खाद्य तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में 1.61 करोड़ टन से अधिक खाद्य तेल का आयात हुआ।
इसका अर्थ है कि खाद्य तेल की बहस सीधे किसान, उपभोक्ता, आयात, विदेशी मुद्रा और राष्ट्रीय खाद्य-सुरक्षा से जुड़ती है। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि संगठित क्षेत्र का हर मिश्रित तेल ‘मिलावट’ है। ऐसा कहना वैज्ञानिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से गलत होगा। लेकिन उतना ही गलत यह मान लेना भी होगा किजो कुछ कानूनन बिक रहा है, उसके बारे में सवाल पूछने की कोई जरूरत नहीं है।
कानून को तीन चीजों के बीच स्पष्ट रेखा खींचनी चाहिए—शुद्ध तेल, घोषित मिश्रित तेल और अवैध मिलावटी तेल।इन तीनों के लिए अलग-अलग नाम, अलग-अलग लेबल और उपभोक्ता के लिए सरल भाषा होनी चाहिए। सामने की ओर बड़े अक्षरों में यह साफ लिखा होना चाहिए कि उत्पाद एकल तेल है या मिश्रित तेल। यदि मिश्रित है तो प्रत्येक तेल का प्रतिशत इतना स्पष्ट हो कि सामान्य उपभोक्ता भी बिना सूक्ष्म अक्षरों और तकनीकी शब्दावली के उसे समझ सके।
यह कदम केवल उपभोक्ता हित में नहीं होगा। इससे किसान को भी लाभ होगा। यदि किसी तेल की पहचान उसकी वास्तविक फसल से जुड़ी है, तो उसके नाम और बाजार मूल्य के बीच रिश्ता मजबूत होगा। सरसों उगाने वाला किसान यह जान सकेगा कि बाजार में बिकने वाले ‘सरसों तेल’ की मांग वास्तव में उसके उत्पाद से जुड़ी है या किसी मिश्रित उत्पाद से।
आज भारत खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 2023-24 में आयात पर निर्भरता लगभग 56.25 प्रतिशत थी, जबकि 2024-25 में देश में तिलहन उत्पादन करीब 4.30 करोड़ टन तक पहुंचा। ऐसे समय में शुद्धता की बहस को केवल छापेमारी और जब्ती तक सीमित रखना उचित नहीं होगा।
जरूरत है एक व्यापक ‘शुद्धता संवाद’की—जिसमें किसान, उपभोक्ता, वैज्ञानिक, खाद्य नियामक, छोटे तेल मिल संचालक और संगठित उद्योग सभी शामिल हों।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपेक्षा यही होनी चाहिए कि सरकार खाद्य तेलों के संदर्भ में ‘शुद्ध’, ‘मिश्रित’ और ‘मिलावटी’ की कानूनी परिभाषाओं को आम नागरिक की भाषा में स्पष्ट करे। इससे न केवल शहरी उपभोक्ता अधिक सुरक्षित और जागरूक होगा, बल्कि ग्रामीण भारत का वास्तविक उत्पादक भी बाजार की नई व्यवस्था में अपनी जगह बेहतर ढंग से बना सकेगा।
मिलावट के खिलाफ लड़ाई जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है यह तय करना कि कानून की नजर में ‘शुद्ध’ आखिर है क्या। क्योंकि जब तक शुद्धता की परिभाषा स्पष्ट नहीं होगी, तब तक मिलावट और वैध मिश्रण के बीच खड़ी महीन रेखा उपभोक्ता के लिए धुंधली ही रहेगी।
लेखक
डॉ. एस. के. द्विवेदी
सहायक आचार्य, वाणिज्य विभाग
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)



