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वर्तमान शिक्षा प्रणाली में समझ और चिंतन के साथ कल्पना शक्ति भी विकसित करने की पहल है EduSkills Hub
फेल होने पर छात्र बेहतर भविष्य से दूर नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य बनाने में समर्थ होंगे: डा. अजय साव
एनई न्यूज भारत, सिलीगुड़ी
'नो डिटेंशन पॉलिसी' समाप्त करते हुए पांचवी से आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए शैक्षिक वार्षिक परीक्षा में पास होना अनिवार्य बताए जाने के बाद अवश्य ही विद्यार्थियों, उनके माता-पिता एवं शिक्षण संस्थानों पर अतिरिक्त दायित्व बढ़ेगा। परीक्षा पास करने के दबाव में 'रटंत कल्चर' की जगह समझ और चिंतन के साथ कल्पना शक्ति भी विकसित हो इसके लिए, शिक्षा को कौशल के साथ जोड़े जाने की पहल के तहत 'EduSkills Hub'' की परिकल्पना की गई है। 'फेल होना भी एक पड़ाव है' शीर्षक से हिंदी बालिका विद्यापीठ के कांफ्रेंस हॉल में परिचर्चा आयोजित की गई। संस्था के संस्थापक डॉ० अजय कुमार साव ने कहा कि फेल होने वाले विद्यार्थी अपने बेहतर भविष्य से दूर नहीं होंगे, बल्कि बेहतर भविष्य बनाने में समर्थ होंगे। इसके लिए सरकार की ओर से अतिरिक्त दो महीने का समय मिलेगा और इस दौरान 'रिमेडियल क्लासेस' की भी व्यवस्था की जाने की बात है। इतना अवश्य है कि बच्चों के पाठ्यक्रम को रुचिकर बनाने की जरूरत है और इसके लिए शिक्षक साथी अपने पढ़ाने के कौशल को अवश्य ही विकसित करें। इस फेल करने की नीति का समर्थन करते हुए हिंदी बालिका विद्यापीठ की प्रधानाचार्या अर्चना शर्मा ने कहा कि बच्चे यदि फेल किए जाते हैं तो इससे उनकी बुनियादी शिक्षा मजबूत होगी और उच्च शिक्षा में जो समस्याएं आज बच्चों को झेलनी पड़ रही है, उसकी संभावना भी समाप्त हो जाएगी। जरूरत है मूलभूत संरचना में पर्याप्त सुधार के साथ शैक्षिक परिवेश को अनुकूल बनाने की।
नक्सलबरी कॉलेज की प्राचार्या डॉ० सविता मिश्रा ने कहा कि 'नो डिटेंशन पॉलिसी' लागू करने के वर्षों बाद जो परिणाम आए, वह आशा के विपरीत ही नहीं, घातक साबित हुए। इसलिए अब 'डिटेंशन पॉलिसी' लाने की जो पहल की जा रही है, वह स्वागत-योग्य है। फेल होना दुखद घटना नहीं, अपने भविष्य को सफल बनाने के लिए जरूरी पड़ाव के रूप में लिया जाना चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि सरकार 'NISHTHA' के तहत शिक्षकों के कौशल को समृद्ध बनाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित करेंगे और ऐसी कार्यशालाओं को शिक्षक भी पूरी निष्ठा, ईमानदारी और जवाबदेही के साथ यदि पूरा करें, तो अवश्य ही कक्षा को रुचिकर बनाते हुए विद्यार्थियों के चिंतन एवं कल्पना शक्ति को परीक्षा के लिए पर्याप्त बनाया जा सकता है।
पूर्व शिक्षक एवं साहित्यकार डॉ० ओमप्रकाश पांडेय ने 'डिटेंशन पॉलिसी' लागू होने के बाद संभावित चुनौतियों को गंभीरतापूर्वक लेते हुए शिक्षक और विद्यार्थियों के माता-पिता के बीच 'सीधा संवाद' को अनिवार्य बताया। ऐसे संवाद से ही माता-पिता बच्चों के फेल होने पर ना तो बच्चों के प्रति अनपेक्षित आचरण करेंगे और ना ही शिक्षण संस्थानों में बच्चों को अगली कक्षा में ले जाने के लिए पैरवी करेंगे, बल्कि बच्चों के बेहतर भविष्य के प्रति सजग बने रहेंगे और उन्हें घर में भी प्रोत्साहित करते रहेंगे। शिक्षक एवं फिल्म निर्माता पराग विश्वास ने कहा कि 'नो डिटेंशन पॉलिसी' के तहत जब बच्चों ने परीक्षा को गंभीरता से नहीं लिया, तब इसका परिणाम यह हुआ कि शिक्षक भी अपनी अतिरिक्त ऊर्जा लगाने से कतराने लगे। शिक्षण संस्थान भी बच्चों के प्रति गंभीरता को बरतने में स्वयं को असमर्थ महसूस करने लगे और इन सबके कारण जो अनुशासनहीनता शिक्षण संस्थानों में जन्म लेने लगी, उससे तो अब ऐसा लगने लगा था कि शायद शिक्षा का ही कोई भविष्य नहीं है, लेकिन जब वर्तमान सरकार 'डिटेंशन पॉलिसी' ला रही है, तो अवश्य ही हम शिक्षक इस पॉलिसी को समर्थन देते हुए शैक्षिक परिवेश को बच्चों के सर्वांगिक विकास के हित में कौशलपूर्ण बनाने की कोशिश करें।
शिक्षिका रजनी भगत ने यह चुनौती प्रस्तुत की कि जब विद्यार्थी 'नो डिटेंशन पॉलिसी' के तहत फेल न किए जाने की सुविधा के भोगी हो चुके हैं, तब उन्हें नई शिक्षा नीति के तहत संस्कारी किया जाना कहां तक संभव हो पाएगा? साथ ही 'नो डिटेंशन पॉलिसी' के दुष्परिणामों को इस रूप में भी दिखाया कि जब बच्चों के पास फेल की कोई चिंता ही नहीं रह गई सरकारी संस्थानों में, तब अभिभावक जो समर्थ रहे, वे सरकारी संस्थानों से हताश होकर निजी संस्थाओं में बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारी संस्थाओं के प्रति आस्था डगमगा गई। जरूरत है कि मूलभूत संरचना को समृद्ध किया जाए, अन्यथा नीतियां अवश्य ही बेहतर विकल्प के रूप में लागू की जाएंगी, लेकिन परिणाम अनुकूल नहीं हो पाएंगे। विद्यार्थियों को जब फेल करने की स्थिति आई, तब शिक्षक भी अपने पढ़ने के कौशल को विकसित करें। शिक्षिका फाल्गुनी सरकार ने कहा कि यदि बच्चों को पाठ्यक्रम विभिन्न कलाओं के माध्यम से पढ़ाया जाए, तो अवश्य ही उनकी रुचि बढ़ेगी। इस अवसर पर गीतांजलि प्रसाद, अंजलि सेठ, रोशनी सेठ, काजल साहनी, संतोष कुमार यादव, गंगा दास, चंचल साहनी, विक्की कुमार प्रसाद, काजल झा और शिवम प्रसाद ने उत्तेजक सवालों एवं सुझावों के साथ परिचर्चा को गति प्रदान की।



