HIGHLIGHTS
उत्कृष्ट रचनाओं से युवा मन का संस्कार किया जा सकता : दिलीप दुगड़
साहित्य से बढ़ती दूरी कम करने के लिए सोशल मीडिया एक जरूरी माध्यम : डॉ० अजय कुमार साव
एनई न्यूज भारत, सिलीगुड़ी
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रेरणा एवं अकादमी के अध्यक्ष विवेक गुप्त की सृजनात्मक पहल के तहत पश्चिम बंगाल हिंदी अकादमी द्वारा 'सोशल मीडिया में साहित्य-साहित्य में सोशल मीडिया' पर संगोष्ठी आयोजित की गई। सिलीगुड़ी के महकमा सूचना एवं संस्कृति अधिकारी अनिर्वान दाम ने स्वागत वक्तव्य में सोशल मीडिया के महत्व और साहित्यकारों की जवाब देही के बीच अनिवार्य संतुलन की बात रखी, तो अकादमी के प्रशासनिक अधिकारी अनूप इयान ने सोशल मीडिया में साहित्यिक प्रस्तुतियों के स्वरूप को संजीदगी से लेने की बात की। अकादमी के सदस्य दिलीप दुगड़ ने संगोष्ठी का स्वागत करते हुए कहा कि सोशल मीडिया जिस तरह से विकृति का एक स्रोत है उसमें उत्कृष्ट रचनाओं से युवा मन का संस्कार किया जा सकता है अन्यथा हमारे बौद्धिक साहित्यिक प्रयास सार्थक नहीं हो पाएंगे।
विषय प्रवर्तन करते हुए अकादमी के सदस्य डॉ० अजय कुमार साव ने कहा कि साहित्यकार सोशल मीडिया के जिम्मेदार नागरिक हैं। यहां प्रकाशित होने की सुविधा है तो साथ ही स्वयं के प्रकाशन के प्रति पाठकों और अन्य साहित्यकार मित्रों की प्रतिक्रिया के निरंतर सृजनात्मक नहीं हो पाने पर आश्चर्य मिश्रित निराशा को देखना पड़ता है।
साथ ही यह चुनौती है कि सोशल मीडिया में वह कैसी रचनाओं को प्रकाशित करेंगे। इसके लिए जरूरी है कि पाठकों में उन्हें 'टारगेटेड पाठक' के अनुसार उनकी समस्याओं को विषय बनाएं। साहित्य से बढ़ती दूरी के लिए सोशल मीडिया एक जरूरी माध्यम है, तो साथ ही साहित्य के विषयों को आज के 'जूमर्स' के हित में समृद्ध बनाने की भी जरूरत है।
बतौर मुख्य वक्ता अकादमी के सदस्य डॉ० संजय जयसवाल ने कहा की सोशल मीडिया में साहित्यिक रचनाओं को साझा करने से पहले इसकी तथ्यगत संरचना को साहित्यकार अपने अनुभव से समृद्ध बनाए। कुछ भी देखा और सुना यदि साहित्य के रूप में सोशल मीडिया में प्रस्तुत किया जाएगा, वह निरर्थक ही नहीं अनर्थकारी भी साबित होगा। बतौर विशिष्ट वक्ता डॉ० रहीम मियां ने कहा कि आज जिस प्रकार सोशल मीडिया में हर कोई कुछ भी लिखकर कवि बनता फिर रहा है, वास्तव में उन्हें न तो कविता की पहचान है, न तत्वों की पहचान। सोशल मीडिया में मूलतः दो तरह का साहित्य लिखा जा रहा है कविता और ब्लॉग लेखन। केवल लाइक एंड कमेंट के द्वारा हम न तो लेखक को माप सकते है और न ही उनकी रचना को।
दूसरी और साहित्य में सोशल मीडिया की बात करें तो 'फेसबुकिया लव' जैसी रचना से लेकर रवीश कुमार की कई रचनाओं में सोशल मीडिया से उपजी कुंठा, त्रास, एकाकीपन आदि की पीड़ा को सहज ही देखा जा सकता है। नेपाली, बंगला से लेकर MT एंडरसन की रचना 'फीड' आदि में सोशल मीडिया की चिंता को भांपा जा सकता है। हिंदी में अभी तक फेसबुक कविता आंदोलन की शुरूआत भी नहीं हुई है जबकि यह आंदोलन नेपाली और बंगला साहित्य में चल रहा है। इंग्रजी साहित्य में इंस्टाग्राम पोएट्री नाम का आंदोलन चल रहा है जहां रचनाकार किसी पुस्तक में छपने से पहले इंस्टाग्राम में अपनी कविता को पोस्ट करते हैं।
अकादमी के सदस्य डॉक्टर ओम प्रकाश पांडे ने फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर साहित्यिक सृजन और उसके साझा करने के लिए विधागयत मर्म को पहचान की बात रखी। डॉ० मुन्नालाल प्रसाद सोशल मीडिया में लाइक्स, शेयर और टिप्पणियां साहित्यिक गुणवत्ता के मानदंड नहीं हो सकते। पाठक के पसंद ना पसंद से आगे समय को बदलने की ताकत से समृद्ध होकर ही सोशल मीडिया में साहित्य का भविष्य देखा जाना चाहिए। अकादमी के सदस्य मनोज यादव ने युवा समाज के समक्ष सोशल मीडिया में साझा की गई साहित्यिक गतिविधियों के महत्व को रूपायित किया। नक्सलबाड़ी कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ० सविता मिश्रा ने 'प्रतिलिपि' जैसे साहित्यिक प्लेटफार्म से युवा समाज को जोड़ने की सलाह दी, वहीं देवेंद्र नाथ शुक्ल ने साहित्य की सृजनात्मक शक्ति के महत्व को उद्घाटित किया। कवियत्री किरण अग्रवाल ने अपनी रचनात्मकता को प्रचलित लाइक की मानसिकता से आगे बताया, तो कल्पना सिंह ने स्वीकार किया कि साहित्यकार भी लाइक्स और मनपसंद टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं और इससे हमें बचाना होगा। नॉर्थ प्वाइंट रेसिडेंशियल स्कूल की प्रधानाचार्या आशिया खातून ने सोशल मीडिया को समाज और युवा पीढ़ी को परस्पर जोड़े रखने का माध्यम बताया, जहां भाषा और भाव से युवा लाभान्वित होंगे।
मारवाड़ी युवा मंच के सचिव प्रणय गोयल ने कहा कि जब रचनाएं अच्छी लगती हैं सोशल मीडिया में तो हम उसे पढ़ते हैं और जब उबाऊ लगती हैं, तो हम आगे बढ़ जाते हैं। अच्छी लगने वाली रचनाओं की पहचान यही है कि वह भाषा के स्तर पर आम पाठकों को भी समझ में आए। देवकोटा संघ के अध्यक्ष मिलन रुचल ने कहा कि सोशल मीडिया वह विधिध विधाओं को धारण करने वाला ऐसा साहित्यिक प्लेटफार्म है, जहां डिजिटल संवाद को संवेदनाओं से समृद्ध किए जाने की जरूरत है।
इस अवसर पर डॉक्टर श्याम सुंदर अग्रवाल, प्रेरणा गुप्ता, ममता मालपानी, प्रियंका जयसवाल, अंजू गुप्ता, सुनम प्रसाद, पराग विश्वास, प्रधानाचार्य श्यामसुंदर शर्मा, फाल्गुनी सरकार, अंजु गुप्ता ने अपनी वैचारिक सहभागिता से इस मुद्दे को विशेष बनाया कि साहित्यकार सोशल मीडिया में लेखकीय सरोकार को संजीदगी से ले। साथ ही साहित्य में सोशल मीडिया के कारण मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को पूरी गंभीरता से सृजनात्मक आयाम दे। साहित्यकार इंद्रजीत कौर ने सोशल मीडिया से जुड़े युवा साथियों को साहित्यिक गतिविधियों से जुड़ने की अपील की और श्रव्य एवं दृश्य माध्यमों में जो भी रचनाएं आ रही हैं उनके प्रति ध्यान आकर्षित किया। इस अवसर पर शिक्षक दिनेश साव, सुरेंद्र प्रसाद साह, कुमारी रीता सिंह, दीपू शर्मा, देबाशीष राय, उपेंद्र यादव, पंकज साह के साथ युवा समाज को नेतृत्व देने वाले कई साहित्यकारों में संतोष यादव, काजल साहनी, काजल झा, अंशु कुमारी गुप्ता, रोशनी सेठ, अंजलि सेठ विक्की प्रसाद, छोटी राय उपस्थित रहीं। विक्की कुमार प्रसाद और निखिल साहनी के सक्रिय प्रबंधन ने आयोजित कार्यक्रम का कुशल संचालन पूर्व शिक्षिका एवं साहित्यकार इंद्रजीत कौर ने किया।



